February 6, 2026

नई दिल्ली

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि विवाह का रजिस्ट्रेशन केवल एक कानूनी औपचारिकता है और इसे शादी के एक साल पूरे होने से पहले आपसी सहमति से तलाक लेने से रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी कभी साथ नहीं रहे हों और विवाह वास्तविक रूप से संपन्न ही न हुआ हो, तो ऐसे मामलों में तलाक की अनुमति दी जा सकती है।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें शादी की तारीख से एक वर्ष पूरा न होने के कारण आपसी सहमति से तलाक की ज्वॉइंट पिटीशन दाखिल करने से इनकार कर दिया गया था।

याचिकाकर्ता का पक्ष

महिला की ओर से दलील दी गई कि विवाह के बाद पति-पत्नी कभी भी साथ नहीं रहे। शादी के तुरंत बाद दोनों अपने-अपने माता-पिता के घर रहने लगे और वैवाहिक जीवन की शुरुआत ही नहीं हो सकी। ऐसे में शादी को केवल कागजी रूप में मौजूद बताया गया।

फैमिली कोर्ट का तर्क

फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 14 का हवाला देते हुए कहा था कि विवाह को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए। कोर्ट का यह भी मानना था कि शादी के तुरंत बाद रजिस्ट्रेशन हो जाना “असाधारण कठिनाई” की श्रेणी में नहीं आता।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी एक भी दिन साथ नहीं रहे और विवाह कभी व्यवहारिक रूप से अस्तित्व में ही नहीं आया, तो ऐसे रिश्ते को जबरन जारी रखने पर जोर देना उचित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह की शादी केवल दस्तावेज़ों तक सीमित रह जाती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि HMA की धारा 14 के तहत दिए गए अपवाद इस मामले में लागू होते हैं। इसी आधार पर अदालत ने दंपति को आपसी सहमति से तलाक की ज्वॉइंट याचिका दाखिल करने की अनुमति दी।

फैसले का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय वैवाहिक मामलों में अदालत के व्यावहारिक और यथार्थवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। कोर्ट ने साफ किया कि केवल शादी का रजिस्ट्रेशन वैवाहिक रिश्ते को मजबूती नहीं देता। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां पति-पत्नी ने कभी साथ जीवन नहीं जिया हो और तलाक को लेकर दोनों सहमत हों।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य विवाह को बचाना है, लेकिन जब रिश्ता सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाए, तो उसे बनाए रखना न्यायसंगत नहीं है।

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