February 6, 2026

ब्रिटेन

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर बुधवार को तीन दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर चीन पहुंचे। यह किसी भी ब्रिटिश पीएम की पिछले आठ वर्षों में पहली यात्रा है। इससे पहले 2018 में तत्कालीन प्रधानमंत्री थेरेसा मे बीजिंग गई थीं। वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक बदलावों के बीच यह दौरा ब्रिटेन-चीन संबंधों में नई दिशा तय करने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बीजिंग पहुंचने पर स्टार्मर का रेड कार्पेट स्वागत किया गया और चीन के वित्त मंत्री लैन फोआन ने उन्हें एयरपोर्ट पर स्वागत किया। पहले दिन स्टार्मर ने चीनी अधिकारियों और ब्रिटिश व्यापार प्रतिनिधियों से मुलाकात की और व्यापार और निवेश के अवसरों पर चर्चा की।

दौरे की पृष्ठभूमि:
पिछले आठ वर्षों में वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव आए हैं। अमेरिकी विदेश और व्यापार नीति में आक्रामक रुख के चलते यूरोपीय देश नए साझेदारों की तलाश कर रहे हैं। इस स्थिति में चीन, यूरोप और विशेष रूप से ब्रिटेन के लिए व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरा है।

चीन रवाना होने से पहले स्टार्मर ने कहा, “अमेरिका हमारे लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन को नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है।” यह बयान ब्रिटेन की संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति की दिशा को दर्शाता है।

ब्रिटेन-चीन संबंधों में सबसे बड़ा झटका 2020 में हुआ, जब कोरोना महामारी के दौरान ब्रिटेन ने हुआवे को अपने 5G नेटवर्क से राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए बाहर कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में ठंडापन देखा गया।

अब ब्रिटेन आर्थिक निवेश और पुनरुत्थान की दृष्टि से चीन के साथ संबंधों को फिर से संतुलित करना चाहता है।

यूरोप-चीन कूटनीतिक नज़दीकी:
स्टार्मर का दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब यूरोप और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियाँ तेज हैं। हाल ही में फिनलैंड और आयरलैंड के पीएम भी चीन का दौरा कर चुके हैं। चीन ने इन बैठकों में स्पष्ट किया कि यूरोप उसके लिए साझेदार है, प्रतिद्वंद्वी नहीं।

दौरे का उद्देश्य:
ब्रिटिश सरकार के अनुसार, इस यात्रा का लक्ष्य बिगड़े रिश्तों को सुधारना, व्यापार और निवेश के नए अवसर खोलना, और जलवायु परिवर्तन व तकनीकी मुद्दों पर सहयोग बढ़ाना है। स्टार्मर ने साफ किया कि वे न तो किसी ‘गोल्डन एरा’ की कल्पना में विश्वास करते हैं और न ही ‘आइस एज’ जैसी सोच में, बल्कि व्यावहारिक और संतुलित नीति अपनाना चाहते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रिटेन अब चीन को न मित्र मान रहा है और न विरोधी, बल्कि वैश्विक हकीकत के रूप में देख रहा है, जिसके साथ जुड़ना आर्थिक और कूटनीतिक रूप से जरूरी है। आने वाले दिनों में इस दौरे के नतीजे व्यापार समझौते और द्विपक्षीय संवाद के रूप में सामने आ सकते हैं।

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